मेड इन बिहार मोबाइल: राहुल गांधी का विजन, चुनौतियाँ और संभावनाएं | एक विश्लेषण

By Amit

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मेड इन बिहार मोबाइल: राहुल गांधी का विजन, चुनौतियाँ और संभावनाएं

जगरन की एक रिपोर्ट के अनुसार, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बिहार में एक जनसभा को संबोधित करते हुए एक बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा, “अब मेड इन चाइना नहीं, मेड इन बिहार होगा मोबाइल।” यह बयान केवल एक नारा भर नहीं है, बल्कि भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र, विशेष रूप से बिहार की औद्योगिक क्षमता पर एक व्यापक दृष्टिकोण की ओर इशारा करता है। यह लेख इसी विजन की पड़ताल करेगा, जिसमें इसकी संभावनाओं, चुनौतियों, आवश्यक नीतिगत ढांचे और विशेषज्ञों की राय को शामिल किया जाएगा।

विजन को समझना: ‘मेड इन बिहार’ का क्या अर्थ है?

राहुल गांधी का यह बयान दो प्रमुख स्तंभों पर टिका हुआ प्रतीत होता है। पहला, चीन पर भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स निर्भरता कम करना, जो एक रणनीतिक और आर्थिक आवश्यकता बन चुकी है। दूसरा, बिहार जैसे राज्यों को देश की आर्थिक विकास यात्रा का केंद्र बिंदु बनाना, जिससे रोजगार सृजन और क्षेत्रीय असंतुलन दूर हो। यह विचार ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प से मेल खाता है, लेकिन इसे एक विशिष्ट भूगोल और जनसांख्यिकीय के साथ जोड़ता है।

बिहार क्यों? राज्य की क्षमता और चुनौतियाँ

बिहार को इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का हब बनाने का विचार कई कारणों से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके सामने गंभीर चुनौतियाँ भी हैं।

क्षमताएँ:

  • युवा जनशक्ति: बिहार में युवाओं की एक विशाल आबादी है, जो किसी भी विनिर्माण इकाई के लिए एक बड़ा संपत्ति साबित हो सकती है।
  • रणनीतिक स्थान: राज्य की भौगोलिक स्थिति इसे पूर्वी और उत्तरी भारत के बाजारों से जोड़ने में मददगार हो सकती है।
  • सरकारी प्रोत्साहन: केंद्र की पीएलआई (उत्पादन लिंक्ड इंसेंटिव) योजना और बिहार सरकार की औद्योगिक नीतियाँ एक आधार तैयार कर सकती हैं।

चुनौतियाँ:

  • बुनियादी ढाँचे की कमी: बिहार में विश्वसनीय बिजली आपूर्ति, उन्नत लॉजिस्टिक नेटवर्क और औद्योगिक क्लस्टरों का अभाव एक बड़ी बाधा है।
  • कौशल विकास: युवाओं को इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली और विनिर्माण के लिए प्रशिक्षित करने की एक बड़ी आवश्यकता है।
  • पारिस्थितिकी तंत्र का अभाव: तमिल नाडु या उत्तर प्रदेश के विपरीत, बिहार में कॉम्पोनेंट सप्लायर्स, रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर्स और विशेषज्ञ इंजीनियर्स का नेटवर्क नहीं है।

विशेषज्ञ दृष्टिकोण: क्या है संभावना और रास्ता?

इस मुद्दे पर विशेषज्ञों की राय मिली-जुली है। कुछ इसे एक राजनीतिक बयान मानते हैं, तो कुछ इसमें छिपी संभावना को देखते हैं।

डॉ. अजय शाह, अर्थशास्त्री और नीति विश्लेषक, कहते हैं, “किसी भी राज्य को इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का केंद्र बनाना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है। बिहार के लिए, पहला कदम सरल असेंबली यूनिट्स से शुरुआत करना हो सकता है, न कि पूर्ण विनिर्माण से। इसके लिए बिजली, कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार मुक्त वातावरण सुनिश्चित करना सबसे पहली शर्त है। ‘मेड इन बिहार’ एक लक्ष्य हो सकता है, लेकिन इसके लिए 10-15 साल की सतत नीति और निवेश की जरूरत होगी।”

अनुराग गुप्ता, इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग संघ के पूर्व अध्यक्ष, इस बात पर जोर देते हैं, “हमें यह समझना होगा कि ‘मेड इन इंडिया’ फोन भी अभी चीनी कॉम्पोनेंट्स पर बहुत अधिक निर्भर हैं। बिहार में मोबाइल बनाने का मतलब है एक पूरी सप्लाई चेन विकसित करना। यह निवेशकों के लिए आकर्षक बनाने, स्किल डेवलपमेंट सेंटर खोलने और टियर-2, टियर-3 शहरों में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने से ही संभव है। सरकार को पीएलआई जैसी योजनाओं को बिहार-केंद्रित करना पड़ेगा।”

सफलता के लिए रोडमैप: ‘मेड इन बिहार’ को हकीकत में कैसे बदलें?

इस विजन को साकार करने के लिए एक ठोस और चरणबद्ध रणनीति की आवश्यकता है:

  1. चरण 1: इकोसिस्टम का निर्माण: सबसे पहले बिजली, सड़क और इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करना होगा। औद्योगिक पार्कों का विकास प्राथमिकता होनी चाहिए।
  2. चरण 2: कौशल विकास: आईटीआई और पॉलिटेक्निक संस्थानों को मोबाइल हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के लिए उन्नत प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने चाहिए।
  3. चरण 3: निवेश को आकर्षित करना: बिहार सरकार को टैक्स छूट, सब्सिडी और आसान भूमि आवंटन जैसे विशेष प्रोत्साहन देने होंगे। पहले घरेलू कंपनियों को आमंत्रित किया जा सकता है।
  4. चरण 4: सप्लाई चेन विकास: छोटे-छोटे कॉम्पोनेंट बनाने वाली इकाइयों को प्रोत्साहित करके एक स्थानीय सप्लाई चेन खड़ी करनी होगी।
  5. चरण 5: रिसर्च एंड इनोवेशन: तकनीकी संस्थानों के साथ मिलकर रिसर्च सेंटर स्थापित करने होंगे।

तुलनात्मक दृष्टिकोण: भारत में अन्य सफल मॉडल

बिहार के लिए तमिल नाडु का ‘इलेक्ट्रॉनिक्स हब’ मॉडल एक अच्छा उदाहरण हो सकता है। श्रीपेरुम्बुदुर और इसके आसपास का इलाका ‘मोबाइल वैली ऑफ इंडिया’ बन चुका है, जहाँ एप्पल, सैमसंग, और फॉक्सकॉन जैसी कंपनियों के प्लांट हैं। इसकी सफलता का कारण बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, कुशल जनशक्ति और उद्योग-अनुकूल नीतियाँ रही हैं। उत्तर प्रदेश में नोएडा और ग्रेटर नोएडा ने भी इसी रास्ते पर चलते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा दिया है। बिहार को इन राज्यों के अनुभवों से सीखना चाहिए।

निष्कर्ष: एक सुदूर दृष्टि, लेकिन प्राप्त करने योग्य लक्ष्य

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का ‘मेड इन बिहार’ मोबाइल का विजन निस्संदेह महत्वाकांक्षी है। यह बिहार के युवाओं में एक नई उम्मीद जगाता है और देश के आर्थिक मानचित्र पर राज्य को एक नई पहचान देने की बात करता है। हालाँकि, इस विजन और वास्तविकता के बीच की खाई को पाटने के लिए एक दीर्घकालिक, गैर-राजनीतिक और सहयोगात्मक प्रयास की आवश्यकता होगी। इसमें केंद्र सरकार, बिहार सरकार, उद्योग जगत और शैक्षणिक संस्थानों की सामूहिक भागीदारी महत्वपूर्ण होगी।

यदि सही नीतियों, निवेश और कार्यान्वयन के साथ आगे बढ़ा गया, तो यह सपना एक दिन ‘मेड इन बिहार’ को ‘मेड इन इंडिया’ की सफलता की कहानी का एक अगला अध्याय बना सकता है। फिलहाल, यह एक दिशा का संकेत है, जिस पर चलने के लिए ठोस कदमों की प्रतीक्षा है।

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